Wednesday, December 24, 2025

इस पल की दरारों में (AMBRISH CHANDRA BHARAT)

इस पल की दरारों में



इस पल की दरारों में-
नीरसता सी भरती जा रही है,
तुझसे मेरी दूरी मुझे-
बेचैन करती जा रही है |

अब दिल मुझसे-
कुछ यूँ कह रहा है,
तेरी जुदाई का गम,
रोम-रोम सह रहा है |

की तू न जाने -
कौन से वक़्त का इंतज़ार कर रही है?
तुझे ह्रदय से लगाने को  -
रूह मेरी तरस रही है |

सांसे खुद से लड़ने लगीं हैं,
तड़प तुझसे मिलने की बढ़ने लगी है,
आसरा मौत का मिल रहा है जैसे,
ज़िंदगी अब मुझसे बिछड़ने लगी है |

क्या हस्र है जान का जॉ मेरी,
कैसे सुनाऊ?
 तुम समझोगी कैसे?

चाँद से चेहरे को देखने की तलब-
हर पल मेरी बढ़ती जा रही है,
क्यों सांसो को ये बेचैन करती जा रही है?

इस पल की दरारों में -
नीरसता सी भरती जा रही है |
तुझसे मेरी दूरी मुझे-
बेचैन करती जा रही है |



 अम्बरीष चन्द्र 'भारत'

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